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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 18
यो वा कुलाधिकं धर्ममज्ञानाद्वदति प्रिये । ब्रह्महत्याधिकं पापं स प्राप्नोति न संशयः ॥
हे प्रिये! जो अज्ञान में पड़कर कुल धर्म से अधिक अन्य धर्मो के विषय में चर्चा करता है तो वह निःसन्देह ब्रह्महत्यादि से भी अधिक पाप को प्राप्त करता है।
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