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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 114
विधिना सेव्यते देवि तरसा त्वं प्रसीदसि । नाशयत्यपरिज्ञानात् सत्यमेव वरानने ॥
विधिपूर्वक सेवन करने से हे देवि! आप शीघ्र प्रसन्न होती है। यथा विधि सेवन न करने से हे वीरवन्दिते! वह आत्मज्ञान को नष्ट करता है।
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