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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 83
लोकधर्मविरुद्धञ्च सिद्धयोगीश्वरि प्रिये । कुलं प्रमाणतां याति प्रत्यक्षफलदं यतः ॥ प्रत्यक्षञ्च प्रमाणाय सर्वेषां प्राणिनां प्रिये । उपलब्धिबलात्तस्य हताः सर्वे कुतार्किकाः ॥ परोक्ष को नु जानीते कस्य किं वा भविष्यति । यद्वा प्रत्यक्षफलदं तदेवोत्तमदर्शनम् ॥
हे सिद्धयोगीश्वरि! हे प्रिये! लोक धर्म के विरुद्ध होते हुए भी प्रत्यक्ष फल देने के कारण कुलधर्म की प्रामाणिकता है। हे प्रिये! सभी जीव प्रत्यक्ष फल चाहते है। उसकी उपलब्धि के बल से सभी कुतर्की मारे गए, क्योंकि परोक्ष को कौन जानता है कि किसका क्या होगा? अतः जो प्रत्यक्ष फल देता है, वही उत्तम दर्शन है।
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