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कुलार्णव • अध्याय 2 • श्लोक 17
कुलधर्मं हि मोहेन योऽन्यधर्मेण दुर्मतिः । बद्धः संसारपाशेन सोऽन्त्यजानां प्रियो भवेत् ॥
यदि कोई मूर्ख अज्ञान में पड़कर अन्य धर्म को कुल धर्म से अधिक मान बैठता है तो वह सांसारिक बन्धनों में बंध जाता है और निम्न जाति के लोगों का प्रिय बन जाता है।
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