कुलधर्मविहीनस्य दिनान्यायान्ति यान्ति च ।
स लोहकारभस्त्रेवश्वसन्नपि न जीवति ॥
कुलधर्म से विहीन जीव के दिन आते हैं और बीत जाते हैं। वह लुहार की धौंकनी के समान श्वास लेता हुआ भी जीवित नहीं है।
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