जन्मान्तरसहस्त्रेषु या बुद्धिर्विहिता नृणाम् ।
तामेव लभते जन्तुरुपदेशो निरर्थकः ॥
पिछले सहस्त्रजन्मों में मनुष्य की जो बुद्धि विकसित होती है, मात्र उसी से जीव को ज्ञान मिलता है, उपदेश की आवश्यकता ही नहीं होती।
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