(दुरात्माओं को भ्रमित करने के लिए ही पशुशास्त्रों का प्रचार) हे देवि! पशुओं को मैंने करोड़ों शास्त्रों से भ्रमित कर रखा है। वे कुलधर्म को नहीं जानते और व्यर्थ के ज्ञान का अभिमान करते हैं। सभी पशु शास्त्रों को मैंने ही दूसरे स्वरूप को ग्रहण कर दुरात्माओं को मुग्ध करने के लिये कहा है। महापाप के वशीभूत होकर उनमें वाञ्छा उत्पन्न होती है। कोटि शतकल्पों में भी उन्हें सद्गति नहीं मिलती। पापात्मा लोग प्रेरित किये जाने पर भी कुल में नहीं आते और पुण्यात्मा लोग मना किये जाने पर भी कुल का ही अवलम्बन करते हैं।
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