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अध्याय 1 — प्रथमोल्लासः

कुलार्णव
102 श्लोक • केवल अनुवाद
एक समय जब देवों के देव, जगद्गुरु, ईश, परानन्द परमेश्वर भगवान्‌ शङ्कर कैलाश पर्वत के शिखर पर बैठे थे तब श्री देवी पार्वती ने उनसे पूछा (जीवों के मोक्ष का उपाय क्या है ?)।
श्री देवी ने कहा - हे भगवान्‌! हे देवदेवेश! हे पञ्च यज्ञो का विधान करने वाले! हे सर्वज्ञ! हे भक्ति से सुलभ होने वाले! हे शरणागतवत्सल! हे कुल के ईश! हे परम ईशान! हे करुणामृत समुद्र वाले! इस सारहीन कठिन संसार मे नाना प्रकार के शरीरों से अनन्त जीव-राशियां सभी (दैहिक, दैविक एवं भौतिक) दुःखों से मलिन (परिपूर्ण) हँ। वे उत्पन्न होती हैं ओर काल के गाल में विलीन हो जाती है। उनका कोई अन्त (मोक्ष) नहीं है। हे देव! अत्यन्त घोर दुःख से व्याकुल होकर वे कभी सुख नहीं भोगती हैं। अतः हे प्रभो! हे देवेश! वे जीव किस उपाय से मुक्त हो सकते हैं? यह मुञ्जसे कहिए।
श्री ईश्वर ने कहा - हे देवि! सुनिये। आपने मुञ्चसे जो पुछा है, उसे बताता हूँ। इसके सुनने मात्र से मनुष्य संसार से मुक्त हो जाता है।
हे देवि! परब्रह्म-स्वरूप शिव ही सत्य है। वह सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, सर्वेश ओर निर्मल एवं अद्वितीय है। वह आदि अन्त से रहित स्वयं ज्योति है तथा निर्विकार, पर से भी परे, निर्गुण ओर सच्चिदानन्द है। सभी जीव संज्ञा वाके उन्हीं शिव के अंश हैं, जो अनादि अविद्या से उपहित (संयुक्त) होकर उनसे उसी प्रकार भिन्न हुए हैं, जैसे कि अग्नि में से चिनगारियां फूट कर अलग होती हैं।
हे प्रिये! वे सभी मूर्ख मनुष्य दुःखदायक अपने कर्मो से गर्भादि उपाधियों से पृथक्‌ होकर तथा अपने पुण्य एवं पापों से नियन्त्रित होकर कर्मवशात्‌ प्रत्येक जन्म में तत्तज्जन्मों मे तत्तद्देह, आयु एवं भोग प्राप्त करते रहते हैँ। उनका लिङ्ग शरीर जब तक मोक्ष प्राप्त नहीं करता तब तक अक्षय बना रहता है।
स्थावर, कृमि, जलचर, मत्स्यादि, पक्षी, मनुष्य, धार्मिक (धर्मशील), देवता - ये क्रमानुसार मोक्ष के अधिकारी हैं। ये सहस्रं जन्म तक चार प्रकार के शरीर बारम्बार धारण कर चौरासी लाख योनियों मे भटकते रहते हैं। तदनन्तर पुण्यवशात्‌ मनुष्य होकर यदि ज्ञान प्राप्त हआ तब मुक्ति को प्राप्त करता है। क्योकि चौरासी लाख शरीरधारियों में मनुष्य शरीर धारण किये बिना तत्वज्ञान नहीं होता।
हे पार्वती! सैकड़ों एवं हजारो योनियों में अच्छे कर्मो के फलस्वरूप कभी वे मानव होकर जब ज्ञानी होते हैं, तब मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
मोक्ष प्राप्ति के लिए सोपान (सीढ़ी) के समान दुर्लभ मनुष्य शरीर को प्राप्त कर जो अपनी आत्मा को मुक्त नहीं करता, उससे बड़ा पापी कौन है?
उत्तम जन्म और सुन्दर इन्द्रियों को पाकर भी जो अपने हित को नहीं समञ्जता वह आत्महत्या करने वाला आत्मघाती है।
मनुष्य शरीर के बिना अन्य शरीरधारी जीव (धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष) पुरुषार्थं नहीं कर सकता। अतः शरीर रूपी धन पाकर पुण्य कर्मो को करना चाहिए।
इस कारण सभी प्रकार से प्रयत्नो द्वारा मनुष्य को अपने आत्मा की रक्षा करनी चाहिए। वस्तुतः आत्मा ही सभी वस्तुओं की प्राप्ति का साधन है। इसीलिए मनुष्य को चाहिए कि वह सभी प्रकार से तब तक अपने आत्मा की रक्षा करे, जब तक तत्त्वज्ञान न हो जाय।
ग्राम, भूमि, धन और गृह तथा शुभ एवं अशुभ कर्म तो बार बार प्राप्त किये जा सकते हैं किन्तु मनुष्य शरीर पुनः पुनः (बार - बार) नहीं प्राप्त होता।
अतः मनुष्य को सदैव अपने शरीर की (आधि व्याधि से) रक्षा करने का प्रयत्न करते रहना चाहिए। कुष्ठ आदि रोगों से ग्रस्त रोगी जन भी शरीर त्याग की इच्छा नहीं करते। जब तक शरीर है तब तक धर्म एवं ज्ञान के लिए शरीर का गोपन (संरक्षण) करना चाहिए। (सदाचारपूर्वक शरीर की रक्षा से किए गए) धर्म से ज्ञान पैदा होता है, ज्ञान ध्यान एवं योग के लिए होता है ओौर उसी ज्ञान के कारण साधक शीघ्र ही मक्त हो जाता है।
अहितकारी (सांसारिक तृष्णादि से) यदि मनुष्य अपने से ही अपने को निकालने का साधन न खोजे तो उसके लिए अन्य हितकारी जन कौन है जो भवसागर से उसे मुक्त कराएगा?
इस संसार मे रहकर ही जो नरक रूपी व्याधि से अपनी चिकित्सा नहीं करता है वह व्याधिग्रस्त मनुष्य बिना ओषधि के फिर अन्य स्थान को जाकर क्या करेगा?
घर में आग लगने पर कौन बेवकूफ कुआं खोदता है? अतः जब तक इस शरीर में आत्मा है तब तक परम तत्तव (पारमार्थिक सत्ता) के ज्ञान के लिए अभ्यास करते रहना चाहिए।
वृद्धावस्था बाघिन के समान (खा जाने के लिए) सामने आकर खड़ी हो जाती है। फूटे हुए घडे से पानी के रिसने के समान धीरे-धीरे आयु क्षीण होती रहती है। शत्रु के समान व्याधि चोट पहुंचाती रहती है। इसीलिए श्रेय का मार्ग अपनाना चाहिए।
जब तक दुःख नहीं आते और जब तक विपत्ति नहीं आती अथवा जब तक इंद्रियाँ अपंग नहीं हो जातीं उसके पहले ही श्रेय का कार्य करते रहना चाहिए।
संसार के नाना प्रकार के कर्मो मे फंसे रहने के कारण काल के बीत जाने का ज्ञान ही नहीं रहता। सुख एवं दुःख में फंसा हआ जीव अपने हित को सोच भी नहीं पाता।
अज्ञान रूपी मदिरा को पीने के कारण जड़ बुद्धि एवं आर्त जन, क्षुधा-तृष्णा से व्याकुल, मरते हुये और अन्य आपत्ति मेँ पड़े हुए अत्यन्त दुःखी जीवों को देखकर भी कभी भय नहीं लगता है।
सम्पत्ति स्वप्न के समान मिथ्या है, यौवन फूल के समान मुरझा जाने वाला है। आयु बिजली के समान क्षणभंगुर है फिर कौन शाश्वत है?
मनुष्य का सौ वर्ष का जीवन बहुत कम है क्योकि आधा समय तो निद्रा में बीत जाता है। बचपन, बुढ़ापा और रोगादि में शेष आधा समय बीतता है जो सर्वथा व्यर्थ है।
जो प्रारम्भ करने योग्य समय में निष्क्रिय अथवा प्रारब्ध के बल पर निष्क्रिय रहता है, जागने योग्य समय में सोने वाला और जो भय योग्य (इस संसार) में विश्वास (आश्वस्त) करता है वह घातकों के द्वारा क्यों नहीं मारा जायगा अर्थात्‌ असावधान व्यक्ति तो मारा ही जायगा।
जल के फेन के समान क्षणभंगुर इस शरीर में पक्षी के समान स्थित जीव इस नाशवान्‌ अप्रिय संसार में किस प्रकार निर्भय रह सकता है?
जो (विषय वासना) अहितकारी है, उसमें जीव हित बुद्धि समझता है और जो (संसार) अनित्य है उसे वह नित्य समझता है। जो व्यर्थ है उसे वह सार्थक समझता है अन्ततः अपनी (ध्रुव) मृत्यु को नहीं देख पाता है।
हे देवि! आपकी माया से मोहित हुआ जीव इन बातों को देखता हुआ भी नहीं देख पाता, सुनता हुआ भी नहीं सुनता तथा पढ़ कर जानते हए भी नहीं जानता।
इस मृत्यु, जरा, रोग रूप ग्राहों से युक्त अगाध काल रूप समुद्र में सारा जगत्‌ डूब रहा है फिर भी जीव कुछ भी नहीं समझ पाता।
यह शरीर प्रतिक्षण जीर्ण होता जा रहा है जो दिखाई नहीं पड़ता। जिस प्रकार पानी में पड़ा हुआ कच्चे मिटटी का धड़ा प्रति क्षण गलता जाता है।
वायु का रोकना सम्भव है। आकाश का खण्ड खण्ड होना भी सम्भव है। तरंग का परस्पर ग्रथन भी हो सकता है किन्तु किसी भी प्रकार आयु के क्षय को नहीं रोका जा सकता।
हे देवि! प्रलय काल में पृथ्वी जल जाती है और मेरु पर्वत भी टूट जाता है तथा समुद्र का जल भी जब सूख जाता है तो फिर इस नश्वर शरीर की क्या औकात है?
वह यही रटता रहता है कि “यह मेरा पुत्र है, यह मेरी पत्नी है, यह मेरा धन है, ये मेरे बन्धु है"। इतने में ही काल रूप भेड़िया आकर बलात्‌ उसे मार डाठता है।
यह काम मैने कर लिया, वह काम करना है, यह कार्य अधूरा है इसी ऊहापोह में रहते हए, हे प्रिये! मृत्यु उसे खा जाती है।
जो कल करना है उसे आज ही करना चाहिए और जो शाम को करना है उसे पूर्वाह्ण में ही कर लेना चाहिए क्योकि मृत्यु किसी की प्रतीक्षा नही करती कि इसने क्या किया है या क्या नहीं किया है।
मृत्यु रूप शत्रु भयानक रोगों वाली सेना को लिए हुए आ गया है। जिसका रास्ता बुढ़ापा दिखा रहा है। इसे जान कर भी आप उसकी ओर क्यों नहीं देखते?
आशा रूपी सूई से खण्ड खण्ड हुई, विषय बासना रूप घृत से सिञ्चित तथा राग एवं द्वेष रूप अग्नि में पके हुए मानव को मृत्यु खा रही है।
चाहे बालक हो या युवा, वृद्ध हो या गर्भस्थ शिशु - सभी को वह (मृत्यु) खा जाती है। इस संसार का यही नियम है।
ब्रह्मा आदि स्वर्गस्थ देवों की भी नश्वरता - ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवता और समस्त भूतजात भी नाश की ओर भाग रहे हैं। अतः अपने कल्याण के लिए साधक को को प्रयत्नशील रहना चाहिए।
जीवन में आयु क्षय के कारण अपने वर्ण और आश्रम के आचारों का पालन न करने से, अनुचित रूप से प्रतिग्रह (धन धान्यादि का ग्रहण करने) से और पर स्त्री एवं पराये धन की लालसा करने से आयु का नाश होता है।
वेदादि शास्त्रों का अभ्यास न करने से, गुरु जनों का पूजन सत्कार न करने से और इन्द्रियों का निग्रह न करने से मनुष्यों की आयु का क्षय होता है।
आधि (मानसिक चिन्ता), व्याधि, विष, शस्त्र, सर्प, पशु आदि जिनके द्वारा जिसकी मृत्यु होनी होती है उसी के द्वारा उस मनुष्य का जीवन समाप्त होता है।
जिस प्रकार जोंक अपना अगला पैर आगे रख कर ही पश्चात् अपना दूसरा पैर आगे रखता है उसी प्रकार जीव आगे के शरीर में जाकर पश्चात् अपना शरीर छोड़ता है। जिस प्रकार शरीर में बाल्य एवं युवावस्था तथा वृद्धावस्था में परिवर्तन होता है अथवा कोई एक घर से दूसरे घर में जाता है उसी प्रकार यह जीव एक देह से दूसरे देह को धारण करता है।
हे देवि! अज्ञानी जन कर्म करके इस लोक तथा परलोक में उसका फल भोगते हैं। इस प्रकार एक योनि से दूसरे योनि में मरते जीते हुए संसार में पुनः पुनः आया जाया करते हैं।
इस संसार में जो कर्म किया जाता है, उसका फल अगले जन्म में भोगने को मिलता है, जिस प्रकार वृक्ष की जड़ को पानी से सींचने पर उसकी डालों में फल दिखाई देते हैं।
दरिद्रता, दुःख, रोग, बन्धन और व्यसन आदि अपने ही अपराध रूपी वृक्ष के फल संसार में शरीरधारियों को मिलते हैं।
सङ्ग (विषयों के प्रति आसक्ति) से ही सभी दोष उत्पन्न होते हैं। अतः निःसङ्ग (अनासक्ति) द्वारा ही मोक्ष मिलता है। इसलिये सङ्ग को छोड़कर तत्त्वनिष्ठ बनकर सुखी होना चाहिए। ज्ञानी व्यक्ति भी विषयों के प्रति आसक्त हो कर गिर जाते हैं फिर सामान्य जन की तो बात ही क्या है।
विषयासक्ति सर्वथा त्याज्य है और विषयासक्ति को यदि सर्वथा न छोड़ सके, तो सज्जनों का सङ्ग करे क्योंकि सज्जनों की संगति संसार रूप रोग की औषधि है। फिर सत्सङ्ग और विवेक - ये दो पुण्य कार्य और अच्छे आँखों के समान निर्मल हैं। जो मनुष्य इनसे रहित है, वह अन्धा ही है, वह फिर क्यों मार्गभ्रष्ट नहीं हो जायगा।
संसार के दोष इस जगत में मनुष्य अपने मन को प्रिय लगने वाले जितने सम्बन्धों को स्थापित करता है उतने ही शोक के शंकु (कील) अपने हृदय में गाड़ता है। हे कुलेश्वरि! जब अपना शरीर भी छोड़ कर इस संसार से जाना है तब किस कारण स्त्री, माता-पिता और पुत्र से सम्बन्ध स्थापित किया जाय। यह संसार दुःख का मूल है। हे प्रिये! जो संसार में लिप्त है, वही दुःखी है। जो उस संसार का त्याग करता है, वह सुखी होता है, अन्य नहीं। यह संसार ही सभी प्रकार के दुःखों का उत्पत्ति स्थान है और समस्त प्रकार की आपत्तियों का आश्रय है। अतः हे प्रिये! सब प्रकार के पापों से पूर्ण इस संसार से दूर रहना चाहिए।
हे देवि! जिसका मन संसार में आसक्त है उसके लिए यह संसार बिना बन्धन के भी बन्धन है। घोर महाविषों से मिश्रित है तथा विना शस्त्र के टुकड़े टुकड़े हो जाता है ।
यह संसार जीवन के आदि, मध्य और अन्त में दुःखदायक है। अतः संसार को छोड़कर तत्त्वनिष्ठ होकर सुखी होना चाहिए।
लोहे एवं लकड़ी के बने हुए पाश (बन्धन) से छुटकारा सम्भव है। किन्तु स्त्री, धन आदि में लिप्त जीव का कभी भी छूटना सम्भव नहीं है।
कुटुम्ब की चिन्ता जिसे है, उसके ज्ञान, शील आदि गुण कच्चे घड़े में रखे हुए जल के समान नष्ट हो जाते हैं।
ओह! कितने खेद की बात है कि विषयों का आहार करने वाले अपने शरीर में स्थित इन्द्रिय रूपी तस्करों से अपना सारा चित्तरूपी धन चुरा लिये जाने के कारण यह सारा संसार विनष्ट हो रहा है।
जैसे मांस का लोभी मत्स्य लोहे के बने शंकु (कील) को नहीं देख पाता है वैसे ही सुख पाने के लोभ में पड़ा हुआ जीव मृत्यु को नहीं देख पाता।
हे प्रिये! हित एवं अहित को न जानकर पेट भरने में ही जो अज्ञानी लोग लगे रहते हैं वे नित्य ही उलटे मार्ग पर जाने वाले नरक को नहीं जानते हैं।
निद्रा, मैथुन और भोजन सभी प्राणियों में समान रूप से होते हैं। किन्तु जो ज्ञानी है, वही "मानव" कहा जाता है। हे प्रिये! ज्ञान से हीन मानव "पशु" है।
हे प्रिये! प्रातःकाल मल मूत्र से, मध्याहन में भूख प्यास से और रात्रि में वासना एवं निद्रा से मनुष्य पीड़ित रहते हैं।
हाय! यह अत्यन्त खेद की बात है कि अपने शरीर, धर्म और स्त्री आदि में आसक्त रहने वाले सभी जीव अज्ञान से मोहित होकर जन्म लेते रहते हैं और मरते रहते हैं।
हे पार्वति! अपने अपने वर्ण और आश्रम के आचार में पड़े हुए सभी मूर्ख मानव परम तत्त्व को नहीं जानते अतः नष्ट हो जाते हैं।
कुछ लोग कर्मनिष्ठ होते हैं, तो कुछ यज्ञ-पूजादि करते हैं। इस प्रकार के अज्ञान में पड़े हुए लोग दूसरों को धोखा देते रहते हैं।
कर्मकाण्ड में निरत विशाल यज्ञों में मन्त्रोच्चारण द्वारा किये गये होम से नाम मात्र संतुष्ट, एक बार भोजन अथवा उपवास आदि नियमों से शरीर को सुखाकर आपकी माया से विमोहित हुए मूर्ख जन परोक्ष पब्रह्म को पाने की इच्छा करते हैं।
हे देवि! जिस प्रकार वल्मीक के ताडन मात्र से महान् सर्प नहीं मरता है? उसी प्रकार शरीर को कष्ट देने मात्र से अविवेकी (अज्ञानी) लोगों को मुक्ति नहीं प्राप्त होती।
दम्भ करने वाले लोग, धन और भोजन कमाने के लिए अनेक प्रकार का वेश धारण कर अपने को ज्ञानी मान कर संसार में घूमते रहते हैं तथा लोगों को भ्रम में डालते हैं।
इस प्रकार संसार के सुख में आसक्त, किन्तु "मैं ब्रह्म हूँ" यह कहने वाले व्यक्ति कर्म और ब्रह्म दोनों से भ्रष्ट होते हैं। अतः अन्त्यज के समान उनका सर्वदा त्याग करना चाहिए।
जिनके लिए घर एवं वन एक समान है ऐसे लज्जा शून्य नग्न होकर घूमने वाले गर्दभादि पशु क्या योगी होते हैं? अर्थात् निर्लज्ज नग्न रह कर घूमने मात्र से कोई योगी नहीं होता।
हे देवि! मिट्टी और भस्म लगाने से यदि मुक्ति मिलती है, तो क्या गाँव की मिट्टी में तथा राख में रहने वाले आमजन क्या मुक्त होते हैं?
हे प्रिये! हरिण आदि पशु घास पत्ते और जल का आहार करते हैं तथा सदैव वन में रहते हैं, तो क्या वे योगी हैं?
मेढ़क, मछली आदि जन्म से मृत्यु तक गंगा आदि नदियों में रहते हैं, तो क्या वे व्रत करने वाले हैं?
हे देवि! तोते और मैना लोगों के सामने आनन्दपूर्वक राम राम का पाठ करते हैं, तो क्या वे इस शब्दीच्चारण मात्र से विद्वान् समझे जाते हैं?
हे परमेश्वरि! कबूतर कंकड़ों का आहार करते हैं और चातक पक्षी पृथ्वी पर पड़ा हुआ जल नहीं पीते, तो क्या वे योगी हो जाते हैं?
हे प्रिये! सूअर आदि पशु जाड़े, गर्मी, धूप को सहन करते हैं, भक्ष्य-अभक्ष्य जिनके लिए समान है, तो क्या वे योगी बन जाते हैं?
इस प्रकार उक्त कर्म लोगों को भ्रम में डालने वाले हैं। हे कुलेश्वरि! मोक्ष का कारण तो साक्षात् तत्त्वज्ञान है।
हे प्रिये! षड्दर्शन रूपी गहरे कुएँ में पड़े हुए लोग पशु-पाशों में बँधे हुये वे परमार्थ को नहीं जानते।
इस वेद शास्त्र रूपी घोर सागर में इधर उधर टक्कर खाते हुए काल रूपी ग्रह से ग्रस्त कुतार्किक निवास करते हैं। डूबते उतराते हुये वे लोग कुतर्क रूपी भयंकर लहरों और मगर घड़ियालों के मध्य फँसे रहते हैं ।
वेद, आगम और पुराणों को जानने वाला जो व्यक्ति परमार्थ को नहीं जानता, उस दाम्भिक का सारा कथन कौए के काँव-काँव के समान निरर्थक होता है।
हे देवि! परतत्त्व से दूर रहकर लोग रात-दिन "यह ज्ञान है यह ज्ञेय है" यही पढ़ते हैं और इसी बात के विचार में व्याकुल रहते हैं।
मूर्ख लोग वाक्य, छन्द, निबन्ध, काव्य और अलङ्कार में किस प्रकार शोभा हो इसी चिन्ता से दुःखी हो व्याकुल रहते हैं।
परम तत्त्व कुछ और है किन्तु लोग व्यर्थ की बातों से क्लेश पाते है। शास्त्र का सद्भाव कुछ और है किन्तु लोग उसकी भिन्न व्याख्या करते हैं।
उन्मनी भाव की चर्चा तो करते हैं किन्तु स्वयं उस भाव को अनुभव नहीं करते। कुछ लोग अहङ्कार से मारे जाते हैं किन्तु उपदेश सुनना नहीं चाहते। वेद शास्त्र अवश्य पढ़ते हैं किन्तु परस्पर विवाद में फंसे रहते हैं। परम तत्त्व को वे उसी प्रकार नहीं जानते जिस प्रकार कलछुल दाल के स्वाद को नहीं जानती।
जैसे शिर पुष्प का वहन तो करता है किन्तु गन्ध तो नासिका ही प्राप्त करती है, वैसे ही वेद एवं शास्त्रों को लोग पढ़ते हैं किन्तु उनके भाव को समझने वाले दुर्लभ हैं।
आत्मस्थ तत्त्व को न जानकर मूढ़ लोग शास्त्रों में मोहित रहते हैं, जैसे ग्वाले के बगल में ही छाग विद्यमान है किन्तु उसे वह मूर्ख कुएँ में ढूँढ़ता है।
संसार का मोह शब्दज्ञान से वैसे ही नष्ट नहीं होता है, जैसे दीपक की बात करने मात्र से अँधेरा दूर नहीं होता।
प्रज्ञा से हीन व्यक्ति का पढ़ना उसी प्रकार है, जैसे अन्धे को दर्पण में दिखाना। हे देवि! प्रज्ञावान् को ही शास्त्र से ज्ञान मिलता है।
विद्या, दान, शूरता आदि गुणों से प्रसिद्ध लोग आगे पीछे, अगल बगल यह विवाद करते रहते हैं कि "कोई तत्त्व इस प्रकार का है, कोई उस प्रकार का है।" इत्यादि विवाद करते हैं किन्तु प्रत्यक्ष को ग्रहण नहीं करते, भला वार्ता करने से क्या प्राप्त होगा। इस प्रकार शास्त्र में जो मोहित है, वे "तत्त्व" से निःसन्देह बहुत दूर रहते हैं।
"यह ज्ञान है, यह ज्ञेय है" - इस प्रकार सर्वत्र सुनना चाहते हैं। इस तरह हे देवि! वे सहस्र वर्षों की आयु में भी शास्त्र का सार नहीं समझ पाते।
वेद आदि अनेक शास्त्र हैं और आयु स्वल्प है और असंख्य विघ्न हैं। अतः सार तत्व को जानना चाहिए जैसे हंस पानी में दूध को पहचान लेता है।
सब शास्त्रों का अभ्यास कर तत्त्व को जानकर बुद्धिमान् व्यक्ति को सभी शास्त्रों को छोड़ देना चाहिये, जिस प्रकार चावल को चाहने वाला भूसी का त्याग कर देता है।
जो अमृत का पान कर तृप्त हो जाता है, वह भोजन की चिन्ता नहीं करता। हे देवि! इसी प्रकार तत्त्व का ज्ञाता शास्त्रों से सम्बन्ध नहीं रखता।
न तो वेदों के अध्ययन से मुक्ति मिलती हैं और न शास्त्रों के पढने से ही। ज्ञान ही से मुक्ति मिलती है। हे वीरवन्दिते! अन्य से नहीं।
मुक्ति में न आश्रम (चार आश्रम) ही कारण है, न दर्शनों के मनन से ही मुक्ति प्राप्त होती है। उसी प्रकार समस्त शास्त्र भी मुक्ति में कारण नहीं केवल ज्ञान ही कारण है।
मुक्तिदायिनी एकमात्र गुरुवाणी है, शेष सभी विद्याएँ विडम्बनामात्र है। काठ के भार से श्रम प्राप्त करने की अपेक्षा एक संजीवन जड़ी का ढोना कहीं अच्छा है।
अद्वैतवाद शिव जी ने कहा है जिसमें किसी प्रकार के कर्म का आयास नहीं है। वह गुरुमुख से ही प्राप्त होता है, अन्य करोडों आगमों से नहीं प्राप्त होता।
ज्ञान दो प्रकार का बताया गया है - एक तो आगम से प्राप्त होता है और दूसरा विवेक से। आगम से प्राप्त ज्ञान शब्द ब्रह्मपरक होता है और विवेक से प्राप्त ज्ञान परब्रह्म का निदर्शक होता है।
कुछ लोग द्वैत को चाहते है तो कुछ अद्वैत को, किन्तु मेरे तत्त्व को वही जानते हैं जो द्वैत-अद्वैत से परे हैं।
यह मेरा है, यह मेरा नहीं है यही दो पद क्रमशः बन्धन और मोक्ष के कारण है। मेरा है - यही जीव को बांधता है। मेरा नहीं है - यह जीव को मुक्ति दिलाता है।
कर्म वही है जो बन्धनकारक न हो और वही विद्या है जो मुक्तिकारक है अर्थात् वही वास्तव में कर्म है, जो बन्धनकारक न हो और वहीं विद्या है, जो मुक्तिकारिणी हो। अन्य कर्म दुःख के कारण होते हैं और अन्य विद्याएँ मात्र शिल्प नैपुण्य हैं।
जब तक कामना उत्तेजित रहती है, जब तक सांसारिक इच्छाएँ बनी रहती है, और जब तक इन्द्रियाँ चञ्चल है, तब तक तत्व की बात कहाँ? जब तक प्रयत्न का वेग है, जब तक संकल्प की कल्पना बनी हुई है और जब तक मन में स्थिरता नहीं है, तब तक तत्व की बात कहाँ?
जब तक देहाभिमान है, जब तक ममता बनी है और जब तक गुरु की दया प्राप्त नहीं है, तब तक तत्त्व की कथा कहाँ? तप, व्रत, तीर्थ, जप, होम, अर्चन आदि तभी तक हैं और वेदशास्त्र आगम की चर्चा भी तभी तक है, जब तक तत्त्व की प्राप्ति नहीं होती।
अतएव, हे देवि! यदि आत्ममुक्ति की इच्छा हो तो सभी प्रयत्नों से सभी अवस्थाओं में सदैव तत्त्वनिष्ठ रहे।
तापत्रय के कष्ट से पीड़ित व्यक्ति स्वधर्मज्ञानरूपी पुष्प और स्वकुलोक्त (अर्थात् अपने कुल धर्म में जो बातें प्रचलित हैं ऐसे) स्वर्ग के फल वाले मोक्षरूप कल्पवृक्ष की छाया का आश्रय ग्रहण करे।
हे पार्वति! अधिक कहने से क्या लाभ? रहस्य की बात सुनिए। कुलधर्म के सिवा मुक्ति नहीं है, यह सत्य है, इसमें सन्देह नहीं है।
अतएव मैं गुरुमुख से उस तत्त्व को जानकर आपसे कहता हूँ, जिससे हे देवि! इस घोर संसार के बन्धन से जीव सहज ही मुक्त हो जाता है।
हे प्रिये! इस प्रकार मैंने आपसे जीवों के जन्म और उनकी स्थिति के विषय में संक्षेप से कहा है। अब हे कुलेशानि! आप और क्या सुनना चाहती है?
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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