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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 80
तत्त्वमात्मस्थमज्ञात्त्वा मूढः शास्त्रेषु मुह्यति । गोपः कक्षगतं छागं कूपे पश्यति दुर्मतिः ॥
आत्मस्थ तत्त्व को न जानकर मूढ़ लोग शास्त्रों में मोहित रहते हैं, जैसे ग्वाले के बगल में ही छाग विद्यमान है किन्तु उसे वह मूर्ख कुएँ में ढूँढ़ता है।
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