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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 41
जीवस्तृणजलौकेव देहा‌द्देहान्तरं व्रजेत् । सम्प्राप्य परमंशेन देहं त्यजति पूर्वजम् ॥ बाल्ययौवनवृद्धत्वं यथा देहान्तरादिकम् । तथा देहान्तरप्राप्तिगृहाद्‌गृहमिवागतः ॥
जिस प्रकार जोंक अपना अगला पैर आगे रख कर ही पश्चात् अपना दूसरा पैर आगे रखता है उसी प्रकार जीव आगे के शरीर में जाकर पश्चात् अपना शरीर छोड़ता है। जिस प्रकार शरीर में बाल्य एवं युवावस्था तथा वृद्धावस्था में परिवर्तन होता है अथवा कोई एक घर से दूसरे घर में जाता है उसी प्रकार यह जीव एक देह से दूसरे देह को धारण करता है।
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