देहदण्डनमात्रेण का मुक्तिरविवेकिनाम् । वल्मीकताडनाद्देवि मृतः किन्नु महोरगः ॥
हे देवि! जिस प्रकार वल्मीक के ताडन मात्र से महान् सर्प नहीं मरता है? उसी प्रकार शरीर को कष्ट देने मात्र से अविवेकी (अज्ञानी) लोगों को मुक्ति नहीं प्राप्त होती।
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