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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 25
अहिते हितबुद्धिः स्यादश्चुवे श्रुवचिन्तकः । अनर्थ चार्थविज्ञानी स्वमृत्युं यो न वेत्ति च ॥
जो (विषय वासना) अहितकारी है, उसमें जीव हित बुद्धि समझता है और जो (संसार) अनित्य है उसे वह नित्य समझता है। जो व्यर्थ है उसे वह सार्थक समझता है अन्ततः अपनी (ध्रुव) मृत्यु को नहीं देख पाता है।
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