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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 96
यावत् कामादि दीप्येत यावत् संसारवासना । यावदिन्द्रियचापल्यं तावत्तत्त्वकथा कुतः ॥ यावत् प्रयत्नवेगोऽस्ति यावत् सङ्कल्पकल्पना । यावन्न मनसः स्थैर्यं तावत्तत्त्वकथा कुतः ॥
जब तक कामना उत्तेजित रहती है, जब तक सांसारिक इच्छाएँ बनी रहती है, और जब तक इन्द्रियाँ चञ्चल है, तब तक तत्व की बात कहाँ? जब तक प्रयत्न का वेग है, जब तक संकल्प की कल्पना बनी हुई है और जब तक मन में स्थिरता नहीं है, तब तक तत्व की बात कहाँ?
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