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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 47
यावतः कुरुते जन्तुः सम्बन्धान्मनसः प्रियान् । तावन्तोऽस्य विशन्त्येते हृदये शोकशङ्कवः ॥ स्वदेहमपि जीवोऽयं त्यक्त्वा याति कुलेश्वरि । केन हेतुना ॥ स्त्रीमातृपितृपुत्रादिसम्बन्धः दुःखमूलो हि संसारः स यस्यास्ति स दुःखितः । तस्य त्यागः कृतो येन स सुखी नापरः प्रिये ॥ प्रभवं सर्वदुः खानामाश्रयं सकलापदाम् । आलयं सर्वपापानां संसारं वर्जयेत् प्रिये ॥
संसार के दोष इस जगत में मनुष्य अपने मन को प्रिय लगने वाले जितने सम्बन्धों को स्थापित करता है उतने ही शोक के शंकु (कील) अपने हृदय में गाड़ता है। हे कुलेश्वरि! जब अपना शरीर भी छोड़ कर इस संसार से जाना है तब किस कारण स्त्री, माता-पिता और पुत्र से सम्बन्ध स्थापित किया जाय। यह संसार दुःख का मूल है। हे प्रिये! जो संसार में लिप्त है, वही दुःखी है। जो उस संसार का त्याग करता है, वह सुखी होता है, अन्य नहीं। यह संसार ही सभी प्रकार के दुःखों का उत्पत्ति स्थान है और समस्त प्रकार की आपत्तियों का आश्रय है। अतः हे प्रिये! सब प्रकार के पापों से पूर्ण इस संसार से दूर रहना चाहिए।
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