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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 6
स्थावराः क्रिमयश्चान्जाः पक्षिणः पशवो नराः। धार्मिकास्रिदशास्तद्न्मोक्षिणश्च यथाक्रमम्‌ ॥ चतुर्विधशरीराणि धृत्वा धृत्वा सहस्रशः। सुकृतान्मानवो भूत्वा ज्ञानी चेन्मोक्षमाप्नुयात्‌ ॥ -चतुरशीतिलक्षेषु शरीरेषु शरीरिणाम्‌ । न मानुष्यं विना यत्र तत्त्वज्ञानं तु लभ्यते॥
स्थावर, कृमि, जलचर, मत्स्यादि, पक्षी, मनुष्य, धार्मिक (धर्मशील), देवता - ये क्रमानुसार मोक्ष के अधिकारी हैं। ये सहस्रं जन्म तक चार प्रकार के शरीर बारम्बार धारण कर चौरासी लाख योनियों मे भटकते रहते हैं। तदनन्तर पुण्यवशात्‌ मनुष्य होकर यदि ज्ञान प्राप्त हआ तब मुक्ति को प्राप्त करता है। क्योकि चौरासी लाख शरीरधारियों में मनुष्य शरीर धारण किये बिना तत्वज्ञान नहीं होता।
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