कर्म वही है जो बन्धनकारक न हो और वही विद्या है जो मुक्तिकारक है अर्थात् वही वास्तव में कर्म है, जो बन्धनकारक न हो और वहीं विद्या है, जो मुक्तिकारिणी हो। अन्य कर्म दुःख के कारण होते हैं और अन्य विद्याएँ मात्र शिल्प नैपुण्य हैं।
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