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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 52
वञ्चिताशेषचित्तैस्तैर्नित्यं लोको विनाशितः । हा हन्त विषयाहारैर्देहस्थेन्द्रियतस्करैः ॥
ओह! कितने खेद की बात है कि विषयों का आहार करने वाले अपने शरीर में स्थित इन्द्रिय रूपी तस्करों से अपना सारा चित्तरूपी धन चुरा लिये जाने के कारण यह सारा संसार विनष्ट हो रहा है।
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