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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 48
अबन्धबन्धनं घोरं मिश्रीकृतमहाविषम् । अशस्त्रखण्डनं देवि संसारासक्तचेतसाम् ॥
हे देवि! जिसका मन संसार में आसक्त है उसके लिए यह संसार बिना बन्धन के भी बन्धन है। घोर महाविषों से मिश्रित है तथा विना शस्त्र के टुकड़े टुकड़े हो जाता है ।
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