अतः मनुष्य को सदैव अपने शरीर की (आधि व्याधि से) रक्षा करने का प्रयत्न करते रहना चाहिए। कुष्ठ आदि रोगों से ग्रस्त रोगी जन भी शरीर त्याग की इच्छा नहीं करते। जब तक शरीर है तब तक धर्म एवं ज्ञान के लिए शरीर का गोपन (संरक्षण) करना चाहिए। (सदाचारपूर्वक शरीर की रक्षा से किए गए) धर्म से ज्ञान पैदा होता है, ज्ञान ध्यान एवं योग के लिए होता है ओौर उसी ज्ञान के कारण साधक शीघ्र ही मक्त हो जाता है।
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