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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 97
यावद्देहाभिमानश्च ममता यावदस्ति हि । यावन्न गुरुकारुण्यं तावत्तत्त्वकथा कुतः ॥ तावत्तपो व्रतं तीर्थ जपहोमार्चनादिकम् । वेदशास्त्रागमकथा यावत्तत्त्वं न विन्दते ॥
जब तक देहाभिमान है, जब तक ममता बनी है और जब तक गुरु की दया प्राप्त नहीं है, तब तक तत्त्व की कथा कहाँ? तप, व्रत, तीर्थ, जप, होम, अर्चन आदि तभी तक हैं और वेदशास्त्र आगम की चर्चा भी तभी तक है, जब तक तत्त्व की प्राप्ति नहीं होती।
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