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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 81
संसार मोहनाशाय शाब्दबोधो न हि क्षमः । न निवर्तेत तिमिरं कदाचिद्दीपवार्त्तया ॥
संसार का मोह शब्दज्ञान से वैसे ही नष्ट नहीं होता है, जैसे दीपक की बात करने मात्र से अँधेरा दूर नहीं होता।
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