आत्मैव यदि नात्मानमहितेभ्यो निवारयेत् ।
कोऽन्यो हितकरस्तस्मादात्मानं तारयिष्यति ॥
अहितकारी (सांसारिक तृष्णादि से) यदि मनुष्य अपने से ही अपने को निकालने का साधन न खोजे तो उसके लिए अन्य हितकारी जन कौन है जो भवसागर से उसे मुक्त कराएगा?
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