पश्यननपि न पश्येत् स श्ृण्वननपि न बुध्यति ।
पठन्नपि न जानाति तवं मायाविमोहितः ॥
हे देवि! आपकी माया से मोहित हुआ जीव इन बातों को देखता हुआ भी नहीं देख पाता, सुनता हुआ भी नहीं सुनता तथा पढ़ कर जानते हए भी नहीं जानता।
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