सङ्गः सर्वात्मना त्याज्यः स चेत्त्वक्तुं न शक्यते । सद्भिः सह स कर्त्तव्यः सतां सङ्गो हि भेषजम् ॥
सत्सङ्गश्च विवेकश्च निर्मलं नयनद्वयम् । यस्य नास्ति नरः सोऽन्धः कथं न स्यादमार्गगः ॥
विषयासक्ति सर्वथा त्याज्य है और विषयासक्ति को यदि सर्वथा न छोड़ सके, तो सज्जनों का सङ्ग करे क्योंकि सज्जनों की संगति संसार रूप रोग की औषधि है। फिर सत्सङ्ग और विवेक - ये दो पुण्य कार्य और अच्छे आँखों के समान निर्मल हैं। जो मनुष्य इनसे रहित है, वह अन्धा ही है, वह फिर क्यों मार्गभ्रष्ट नहीं हो जायगा।
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