श्रीदेव्युवाच
भगवन् देवदेवेश पञ्चक्रतुविधायक । सर्वज्ञ भक्तिसुलभ शरणागतवत्सल ॥ कुलेश॒ परमेशान करूणामृतवारिधे । असारे घोरसंसारे सर्वदुःखमलीमसाः ॥ नानाविधशशरीरस्था अनन्ता जीवराशयः । जायन्ते च ग्रियन्ते च तेषां मोक्षो न विद्यते ॥ सदा दुःखातुरा देव न सुखी विदयते क्वचित् । केनोपायेन देवेश मुच्यते वद् मे प्रभो ॥
श्री देवी ने कहा - हे भगवान्! हे देवदेवेश! हे पञ्च यज्ञो का विधान करने वाले! हे सर्वज्ञ! हे भक्ति से सुलभ होने वाले! हे शरणागतवत्सल! हे कुल के ईश! हे परम ईशान! हे करुणामृत समुद्र वाले! इस सारहीन कठिन संसार मे नाना प्रकार के शरीरों से अनन्त जीव-राशियां सभी (दैहिक, दैविक एवं भौतिक) दुःखों से मलिन (परिपूर्ण) हँ। वे उत्पन्न होती हैं ओर काल के गाल में विलीन हो जाती है। उनका कोई अन्त (मोक्ष) नहीं है। हे देव! अत्यन्त घोर दुःख से व्याकुल होकर वे कभी सुख नहीं भोगती हैं। अतः हे प्रभो! हे देवेश! वे जीव किस उपाय से मुक्त हो सकते हैं? यह मुञ्जसे कहिए।
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