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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 17
व्याघ्रीवास्ते जरा चायु्यति भिननघटाम्बुवत्‌ । निघ्नन्ति रिपुवद्रोगास्तस्माच्छेयः समाचरेत्‌ ॥
वृद्धावस्था बाघिन के समान (खा जाने के लिए) सामने आकर खड़ी हो जाती है। फूटे हुए घडे से पानी के रिसने के समान धीरे-धीरे आयु क्षीण होती रहती है। शत्रु के समान व्याधि चोट पहुंचाती रहती है। इसीलिए श्रेय का मार्ग अपनाना चाहिए।
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