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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 11
रक्षेत्‌ स्वत्मिनात्मानम्‌ आत्मा सर्वस्य भाजनम्‌ । रक्षणे यत्नमातिष्ठेत्‌ यावत्तत्व॒ न पश्यति ॥
इस कारण सभी प्रकार से प्रयत्नो द्वारा मनुष्य को अपने आत्मा की रक्षा करनी चाहिए। वस्तुतः आत्मा ही सभी वस्तुओं की प्राप्ति का साधन है। इसीलिए मनुष्य को चाहिए कि वह सभी प्रकार से तब तक अपने आत्मा की रक्षा करे, जब तक तत्त्वज्ञान न हो जाय।
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