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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 62
धनाहारार्जने युक्ता दाम्भिका वेषधारिणः । भ्रमन्ति ज्ञानिवल्लोके भ्रामयन्ति जनानपि ॥
दम्भ करने वाले लोग, धन और भोजन कमाने के लिए अनेक प्रकार का वेश धारण कर अपने को ज्ञानी मान कर संसार में घूमते रहते हैं तथा लोगों को भ्रम में डालते हैं।
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