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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 5
गभद्युपाधिसंभिनाः कर्मभिः करणादिभिः ॥ सर्वदुःखप्रदैः स्वीयपुण्यपापैर्नियन्निताः। तत्तज्जातियुतं देहम्‌ आयुभोगञ्च कर्मजम्‌ ॥ प्रतिजन्म प्रपद्यन्ते मानुषा मूढचेतसः । सृक्ष्मलिङ्गशरीरन्तदामोक्षादक्षयं प्रिये ॥
हे प्रिये! वे सभी मूर्ख मनुष्य दुःखदायक अपने कर्मो से गर्भादि उपाधियों से पृथक्‌ होकर तथा अपने पुण्य एवं पापों से नियन्त्रित होकर कर्मवशात्‌ प्रत्येक जन्म में तत्तज्जन्मों मे तत्तद्देह, आयु एवं भोग प्राप्त करते रहते हैँ। उनका लिङ्ग शरीर जब तक मोक्ष प्राप्त नहीं करता तब तक अक्षय बना रहता है।
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