मांसलुब्यो यथा मत्स्यो लौहशंकुं न पश्यति ।
सुखलुब्धस्तथा देही यमबाधां न पश्यति ॥
जैसे मांस का लोभी मत्स्य लोहे के बने शंकु (कील) को नहीं देख पाता है वैसे ही सुख पाने के लोभ में पड़ा हुआ जीव मृत्यु को नहीं देख पाता।
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