कथयन्त्युन्मनीभावं स्वयं नानुभवन्ति हि । अहङ्कारहताः केचिदुपदेशविवर्जिताः ॥
पठन्ति वेदशास्त्राणि विवदन्ति परस्परम् । न जानन्ति परं तत्त्वं दीं पाकरसं यथा ॥
उन्मनी भाव की चर्चा तो करते हैं किन्तु स्वयं उस भाव को अनुभव नहीं करते। कुछ लोग अहङ्कार से मारे जाते हैं किन्तु उपदेश सुनना नहीं चाहते। वेद शास्त्र अवश्य पढ़ते हैं किन्तु परस्पर विवाद में फंसे रहते हैं। परम तत्त्व को वे उसी प्रकार नहीं जानते जिस प्रकार कलछुल दाल के स्वाद को नहीं जानती।
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