जनाः कृत्वेह कर्माणि सुखदुःखानि भुञ्जते ।
परत्राज्ञानिनो देवि यान्त्यायान्ति पुनः पुनः ॥
हे देवि! अज्ञानी जन कर्म करके इस लोक तथा परलोक में उसका फल भोगते हैं। इस प्रकार एक योनि से दूसरे योनि में मरते जीते हुए संसार में पुनः पुनः आया जाया करते हैं।
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