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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 45
निःसङ्ग एव मोक्षः स्याद्दोषाः सर्वे च सङ्गजाः । तस्मात् सङ्ग परित्यज्य तत्त्वनिष्ठः सुखी भवेत् । सङ्गाच्च चलते ज्ञानी चावश्यं किमुताल्पवित् ॥
सङ्ग (विषयों के प्रति आसक्ति) से ही सभी दोष उत्पन्न होते हैं। अतः निःसङ्ग (अनासक्ति) द्वारा ही मोक्ष मिलता है। इसलिये सङ्ग को छोड़कर तत्त्वनिष्ठ बनकर सुखी होना चाहिए। ज्ञानी व्यक्ति भी विषयों के प्रति आसक्त हो कर गिर जाते हैं फिर सामान्य जन की तो बात ही क्या है।
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