यथामृतेन तृप्तस्य नाहारेण प्रयोजनम् ।
तत्त्वज्ञस्य तथा देवि न शास्त्रेण प्रयोजनम् ॥
जो अमृत का पान कर तृप्त हो जाता है, वह भोजन की चिन्ता नहीं करता। हे देवि! इसी प्रकार तत्त्व का ज्ञाता शास्त्रों से सम्बन्ध नहीं रखता।
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