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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 29
युज्यते वेष्टनं वायोराकाशस्य च खण्डनम्‌ । ग्रथनञ्चे तरङ्गाणामास्था नायुषि युज्यते ॥
वायु का रोकना सम्भव है। आकाश का खण्ड खण्ड होना भी सम्भव है। तरंग का परस्पर ग्रथन भी हो सकता है किन्तु किसी भी प्रकार आयु के क्षय को नहीं रोका जा सकता।
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