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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 83
अग्रतः पृष्ठतः केचित् पार्श्वयोरपि केचन । तत्त्वमीदृक् तादृ‌गिति विवदन्ति परस्परम् ॥ सद्विद्यादानशूराद्यैर्गुणैर्विख्यातमानवाः प्रत्यक्षग्रहणं नास्ति वार्त्तया ग्रहणं कुतः । एवं ये शास्त्रसम्मूढास्ते दूरस्था न संशयः ॥
विद्या, दान, शूरता आदि गुणों से प्रसिद्ध लोग आगे पीछे, अगल बगल यह विवाद करते रहते हैं कि "कोई तत्त्व इस प्रकार का है, कोई उस प्रकार का है।" इत्यादि विवाद करते हैं किन्तु प्रत्यक्ष को ग्रहण नहीं करते, भला वार्ता करने से क्या प्राप्त होगा। इस प्रकार शास्त्र में जो मोहित है, वे "तत्त्व" से निःसन्देह बहुत दूर रहते हैं।
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