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कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 44
दारिद्र्यदुःखरोगाश्च बन्धनव्यसनानि च । आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम् ॥
दरिद्रता, दुःख, रोग, बन्धन और व्यसन आदि अपने ही अपराध रूपी वृक्ष के फल संसार में शरीरधारियों को मिलते हैं।
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