मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
कुलार्णव • अध्याय 1 • श्लोक 63
सांसारिकसुखासक्तं ब्रह्मज्ञोऽस्मीति वादिनम् । कर्मब्रह्मोभयभ्रष्टं तं त्यजेदन्त्यजं यथा ॥
इस प्रकार संसार के सुख में आसक्त, किन्तु "मैं ब्रह्म हूँ" यह कहने वाले व्यक्ति कर्म और ब्रह्म दोनों से भ्रष्ट होते हैं। अतः अन्त्यज के समान उनका सर्वदा त्याग करना चाहिए।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
कुलार्णव के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

कुलार्णव के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें