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अध्याय 6 — षष्ठम अध्याय

मनुस्मृति
96 श्लोक • केवल अनुवाद
ब्रह्मचर्याश्रम के बाद समावर्तन संस्कार को प्राप्त स्नातक द्विज इस प्रकार (पञ्चमाध्यायोक्त) विधिपूर्वक गृहस्थाश्रम में रहकर आगे (इसी षष्ठ अध्याय में कथित) नियम से जितेन्द्रिय होकर वन में निवास करे।
जब गृहस्थाश्रमी बली (अपने शरीर के चमड़े को सिकुड़ा हुआ) पके हुए बाल तथा अपने पुत्र के पुत्र (पौत्र) को देख ले, तब वन का आश्रय, (वानत्रस्थाश्रम में प्रवेश) करे ।
ग्राम्य आहार (धान, यव आदि ग्राम सम्बन्धी भोजन) तथा परिच्छद (गौ, घोड़ा, हाथी, शय्या आदि गृह-सम्पत्ति) को छोड़कर वन में जाने की इच्छा नहीं करने वाली अपनी पत्नी को पुत्र के उत्तरदायित्व (देख-रेख) में सौंपकर तथा वन में साथ जाने की इच्छा करने वाली अपनी पत्नी को साथ में लेकर वन को जावे।
श्रौत तथा आवसथ अग्नि और खुकखुवा आदि तत्सम्बन्धी सामग्री लेकर ग्राम से बाहर वन में जाकर जितेन्द्रिय होकर रहे।
पवित्र अनेकविध मुन्यन्न (नीवार आदि) अथवा शाक, मूल और फल आदि से पूर्वोक्त (३।७०) पञ्चमहायज्ञों को विधिपूर्वक करता रहे।
मृग आदि का चर्म या पेड़ों का वल्कल धारण करे, सायंकाल तथा प्रातःकाल स्नान करे और सर्वदा जटा, दाढ़ी, भूँछ एवं नख को धारण करे (क्षौर कर्म न करावे)।
जो भोज्य पदार्थ (६।५-- मुन्यन्न तथा शाक-मूल-फलादि) हो, उसी से बलि (बलिवैश्वदेवदि पञ्चमहायज्ञ कर्म) करे, भिक्षा दे और जल, कन्द तथा फलों की भिक्षा देकर आये हुए अतिथियों का सत्कार करे।
सर्वदा वेदाभ्यास में लगा रहे; ठंडा-गर्म, सुख-दुःख, मान-अपमान आदि द्वन्दवों को सहन करे; सबसे मित्रभाव रखे, मन को वश में रखे, दानशील बने, दान न ले और सब जीवों पर दया करे।
दर्श (अमावस्या), पौर्णमास (पूर्णिमा-सम्बन्धी) पर्वों को यथा समय त्याग नहीं करता हुआ (वानप्रस्थाश्रमी) विधिपूर्वक वैतानिक अग्निहोत्र करता रहे।
नक्षत्रयाग, आग्रहायण (नव-सस्य) याग, चातुर्मास्य याग, उत्तरायण याग और दक्षिणायन याग को श्रौतस्मार्त विधि से क्रमशः करे।
वसन्त तथा शरद्‌ ऋतु में पैदा हुए एवं स्वयं लाये गये पवित्र मुन्यन्नों से पुरोडाश तथा चरु को शास्त्रानुसार (उक्त कार्य की सिद्धि के लिए) अलग-अलग तैयार करे।
वन में उत्पन्न अत्यन्त पवित्र उस हविष्यान्न से देवों के उद्देश्य से हवन कर बचे हुये अन्न को भोजन करे तथा स्वयं बनाये हुए लवण (क्षार मिट्टी से बनाये गये नमक) को काम में लावे।
भूमि तथा जल में उत्पन्न शाक को, वृक्षों के पवित्र पुष्प, मूल तथा फल को और फलों से बने स्नेह को भोजन करे।
मधु (शहद), मांस, पृथ्वी में उत्पन्न छत्राक; भूस्तृण (मालव देश में प्रसिद्ध जल में उत्पन्न होने वाला शाक-विशेष), शिग्रुक (सहिजन) और लसोड़े का फल का त्याग करे (इन्हें नहीं खावे)।
पूर्वसञ्चित मुन्यन्न (नीवार आदि) पुराने वस्र (वल्कल, चीर आदि) और शाक, कन्द एवं फल का आश्विन मास में त्याग कर दे।
वन में भी हल से जुती हुई भूमि में उत्पन्न (किसान आदि के द्वारा) छोड़े गये भी व्रीह्यादि अन्न को तथा ग्राम में (बिना हल से जुती हुई भूमि में भी) उत्पन्न मूल (कन्द) और फल को (भूख से) पीड़ित होकर भी न खावे।
(वानप्रस्थी) अग्नि में पकाये हुए अन्नादि को खाने वाला बने, अथवा स्वनियत समय पर पकने वाले (फल आदि) पदार्थो को खाने वाला बने, अथवा अश्मकुट्ट (पत्थर से अन्नादि फोड़ या कूट-पीसकर खाने वाला) बने, अथवा दन्तोलूखलिक (सब भक्ष्य पदार्थों को दाँतों से ही चबाकर खाने वाला) बने।
(वानप्रस्थी) एक दिन, एक मास, छ: मास या एक वर्ष तक खाने योग्य नीवार आदि मुन्यन्न का संग्रह करे।
(वानप्रस्थी) यथाशक्ति अन्न को लाकर सायंकाल (रात्रि में), या दिन में अथवा एक दिन पूरा उपवासकर दूसरे दिन सायंकाल, या तीन रात उपवासकर चौथे दिन सायंकाल भोजन करे।
अथवा शुक्ल तथा कृष्णपक्ष में चान्द्रायण के नियम (११।२१६) से भोजन करे, अथवा अमावस्या तथा पूर्णिमा को दिन या रात्रि में केवल एक बार पकाई हुई यवागू का भोजन करे।
अथवा वैखानस (वानप्रस्थ) आश्रम में रहने वाला (वानप्रस्थी यती) सर्वदा केवल समय पर पके स्वयं गिरे हुए फूल तथा मूल और फलों से ही जीवन निर्वाह करे।
भूमि पर लेटे तथा टहले या पैर के अगले भाग (चौत्र) पर दिन में कुछ समय तक खड़ा रहे या बैठा रहे (बीच-बीच में टहले नहीं अर्थात्‌ घूमे-फिरे नहीं) और प्रातःकाल, मध्याह्रकाल तथा सायंकाल में (तीन बार) स्नान करे।
अपनी तपस्या को बढ़ाता हुआ (वानप्रस्थी यदि) ग्रीष्म ऋतु में पञ्चाग्नि ले, वर्षा ऋतु में खुले मैदान में रहे (छाये हुए मकान का आश्रय या छाया आदि को पानी बरसते रहने पर भी न ले) और शीत (हेमन्त) ऋतु में गीला कपड़ा धारण करे।
तीनों समय (प्रातः, मध्याह्न और सायं) स्नान करता हुआ देवताओं, ऋषियों तथा पितरों का तर्पण करे और कठोर तपस्या करता हुआ अपने शरीर को सुखा दे (क्षीण कर दे)।
वानप्रस्थाश्रम के नियमानुसार वैतानिक अग्नि को आत्मा में रखकर (उस अग्नि के भस्म आदि को पीकर) वन में भी अग्नि और गृह का त्यागकर केवल मूल (कन्द आदि) तथा फल को खावे (नीवार आदि पवित्र मुन्यन्न का भी त्याग कर दे)।
(वानप्रस्थाश्रमी) सुख-साधक-साधनों में उद्योग छोड़कर ब्रह्मचारी, भूमि पर सोने वाला, निवास स्थान में ममत्वरहित हो पेड़ों के मूल (पेड़ों के नीचे का स्थान) को घर समझकर निवास करे।
(फल मूल के सर्वथा असम्भव हो जाने पर वानप्रस्थाश्रमी) जीवननिर्वाह के लिये केवल तपस्वी वानम्रस्थश्रमियों के यहाँ भिक्षाग्रहण करे और उनका भी अभाव होने पर वन में निवास करने वाले अन्य गृहस्थ द्विजों से भिक्षा ग्रहण करे।
उन वनवासी गृहस्थी का भी अभाव होने पर वन में ही निवास करता हुआ (वानप्रस्थी तपस्वी) ग्राम से पत्रों में या सकोरों के खण्डों में अथवा हाथ में ही भिक्षा को लाकर केवल आठ ग्रास भोजन करे।
वन में निवास करता हुआ (वानप्रस्थी) ब्राह्मण इन नियमों को तथा स्वशास्रोक्त नियमों को सेवन करे और आत्मसिद्धि (ब्रह्मप्राप्ति) के लिए उपनिषदों तथा वेदों में कथित विविध वचनों का अभ्यास करे।
क्योंकि ब्रह्मज्ञानी ऋषियों, ब्राह्मणों और गृहस्थों ने विद्या (ब्रह्म-विषयक ज्ञान) और तपस्या (धर्म) की वृद्धि के लिए ही इन (उपनिषदों और वेदों) का सेवन (अभ्यास) किया है।
अचिकित्सित रोग आदि के उत्पन्न होने पर सरल बुद्धि वाला (वानप्रस्थयति) केवल जल और वायु के आहार पर रहता हुआ शरीर के पतन (मरण) होने तक दक्षिण दिशा की ओर चले।
पूर्वोक्त महर्षि-पालित नियमों में से किसी एक का पालन करता हुआ शोक तथा भय से रहित ब्राह्मण शरीर त्यागकर ब्रह्मलोक में पूजित होता (मोक्ष को प्राप्त करता) है।
अपनी वय के तीसरे भाग को इस प्रकार (तपश्चर्यादि के द्वारा) वन में बिताकर वय के चौथे भाग में सब विषय-सङ्गोँ का त्यागकर संन्यासाश्रम का पालन करना चाहिए।
एक आश्रम से दूसरे आश्रम में (ब्रह्मचर्याश्रम से गृहस्थाश्रम में और गृहस्थाश्रम से वानप्रस्थाश्रम में) आकर यथाशक्ति हवनकर जितेन्द्रीय रहता हुआ, भिक्षाचरण एवं बलिकर्म से श्रान्त (थका) हुआ द्विज विषयाशक्ति का त्याग करता (संन्यास लेता) हुआ मरकर ब्रह्मभूत हो अतिसिद्धि (मुक्तिरूप अतिशयित सिद्धि) को प्राप्त करता है।
तीन ऋणों (देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण) को पूरा करके ही मन को मोक्ष में लगाये (संन्यास ग्रहण करे), उन तीन ऋणों को पूरा किये बिना (उनसे बिना छुटकारा पाये) मोक्ष का सेवन (संन्यास का ग्रहण) करने वाला नरक को जाता है।
विधिपूर्वक वेदों को पढ़कर, धर्मानुसार पुत्रों को उत्पन्रकर और शक्ति के अनुसार यज्ञों का अनुष्ठानकर (द्विज) मोक्ष (मोक्षसाधकसंन्यासाश्रम के पालन) में मन को लगावे।
द्विज बिना वेद का अध्ययन किये, तथा पुत्रों को बिना उत्पन्न किये और (अग्निष्टोम आदि) यज्ञों का बिना अनुष्ठान किये मोक्ष को (संन्यासाश्रम के ग्रहण द्वारा) चाहता हुआ भी नरक को जाता है।
जिसमें समस्त सम्पत्ति को दक्षिणा रूप में दे देते हें ऐसे प्राजापत्य (प्रजापति जिसके देव हें ऐसा) यज्ञ को अनुष्ठान कर और उसमें कथित विधि से अपने में अग्नि का आरोप कर ब्राह्मण घर से (निकलकर) संन्यास आश्रम को ग्रहण करे।
जो सब (स्थावर तथा जङ्गम) प्राणियों के लिये अभय देकर गृह से संन्यास ले लेता है, उस ब्रह्मज्ञानी के तेजोमय लोक (ब्रह्मलोक आदि) होते हैं अर्थात्‌ वह उन लोकों को प्राप्त करता है।
जिस द्विज से अन्य जीवों को लेशमात्र भी भय उत्पन्न नहीं होता, शरीर से विमुक्त (मरे) हुए उस द्विज को कहीं से भी भय नहीं होता (वह सर्वदा के लिए निर्भय हो जाता है)।
पवित्र कमण्डलु, दण्ड आदि से युक्त मौन धारण किया हुआ घर से निकला हुआ और उपस्थित (किसी के द्वारा लाये गये) इच्छा-प्रवर्तक वस्तु (स्वादिष्ट, भोज्य एवं मृदु वस्त्रादि) में निःस्पृह होकर संन्यास ग्रहण करे।
अकेले (दूसरे के संगरहित संन्यासी) की सिद्धि को देखता हुआ द्विज दूसरे किसी का साथ न करके अकेला ही मोक्ष के लिए चले (घर से निकले) इस प्रकार वह किसी को नहीं छोड़ता है और न उसे कोई छोड़ता है।
लौकिक अग्नि से रहित, गृह से रहित शरीर में रोगादि होने पर भी चिकित्सा आदि का प्रबन्ध न करने वाला, स्थिर बुद्धि वाला, ब्रह्म का मनन करने वाला और ब्रह्म में ही भाव रखने वाला संन्यासी भिक्षा के लिए ग्राम में प्रवेश करे।
(भिक्षा के लिये) कपाल (मिट्टी का फूटा-बर्तन), (रहने के लिये) पेड़ों की जड़ (वृक्ष के नीचे का भूभाग) पुराना व मोटा या वृक्ष का वल्कल कपड़ा (लंगोटी आदि), अकेलापन, ममता और सबसे (ब्रहमबुद्धि रखते हुए) समान भाव; ये मुक्त के लक्षण माने गये हैं।
मरने या जीने इन दोनों में से किसी का चाहना न करे किन्तु नौकर जिस प्रकार वेतन की प्रतीक्षा करता है, उसी प्रकार काल (स्वकर्माधीन मृत्यु समय) की प्रतीक्षा करता रहे।
देखने से पवित्र (बालू, कूड़ा, थूक-खकार आदि से रहित) भूमि पर पैर रखे (चले या ठहरे), कपड़े से (छानने से) पवित्र जल पीवे, सत्य से पवित्र बात कहे और मन से पवित्र (कार्य का) आचरण करे।
मर्यादा से बाहर (भी) किसी के कही हुई बात को सहन करे, किसी का अपमान न करे और इस (नश्वर) शरीर को धारण कर किसी के साथ बैर न करे।
क्रोध से युक्त भी किसी के ऊपर स्वयं क्रोध न करे। किसी के अपनी निन्दा करने पर भी उससे मधुर (निन्दा रहित) बात कहे और सप्त द्वारो से निर्गत विनाश शील (व्यर्थ) वाणी न बोले।
ब्रह्म के ध्यान में लीन, (स्वस्तिक, पद्म आदि) योगासनों में बैठा हुआ अपेक्षा (कमण्डलु, दण्ड, वस्त्र आदि की सुन्दरता, नवीनता या अधिकता आदि को चाहना) से रहित, मांस (विषयों के भोग का स्वादरूप मांस) की अभिलाषा से रहित और शरीर मात्र सहायक से युक्त (बिलकुल अकेला) मोक्ष सुख को चाहने वाला (संन्यासी) इस संसार में विचरण करे।
उत्पात (भूकम्प, उल्कापात आदि) निमित्त (शरीर या नेत्रादि का फड़कना), नक्षत्र (अश्विनी आदि), अङ्गविद्या (हस्तरेखा आदि), अनुशासन (ऐसी राजनीति है इस मार्ग से चले आदि) और बाद (शास्रो के अर्थ-- कथात्मक आदि) से कभी भी भिक्षा लेने की इच्छा न करे।
बहुत से वानप्रस्थियों या अन्य साधुओं, ब्राह्मणों, पक्षियों कुत्तों या दूसरे भिक्षुकों से युक्त (जहाँ ये पहुँचे हों ऐसे) घर में (भिक्षा के लिये) न जावे।
बाल, नाखून और दाढ़ी-मूँछ कटवाकर (बिलकुल मुण्डन कराकर) भिक्षापात्र (मिट्टी का सकोरा आदि), दण्ड तथा कमण्डलु को लिये हुए सभी (किसी भी) प्राणी को पीड़ित न करता हुआ संन्यासी) सर्वदा विचरण करे।
उस (संन्यासी) के भिक्षापात्र धातु (सुवर्ण; चाँदी, तांबा आदि के न हों) छिद्ररहित हों, उनकी शुद्धि यज्ञ में चमस के समान केवल पानी से होती है।
तुम्बा, लकड़ी, मिट्टी, बांस के पात्र यतियों (संन्यासियों) के हों, ऐसा स्वयम्भुपुत्र मनु ने कहा है।
संन्यासी जीवन-निर्वाह के लिये दिन में एक बार ही भिक्षाग्रहण करे तथा उसको भी अधिक प्रमाण में लेने में आसक्ति न करे; क्योंकि भिक्षा में आसक्ति हो जाती है (वह ठीक नहीं है)।
(गृहाश्रमियों के) घरों में जब.धुँआ दिखाई न पड़ता हो, मूसल का (अन्न कूटने के लिये) शब्द न होता हो, आग बुझ गयी हो, सब लोग भोजनकर लिये हों और खाने के पात्र (मिट्टी के सकोरे, पत्तल, दोने आदि) बाहर फेंक दिये गये हो; तब भिक्षा के लिये संन्यासी प्रतिदिन निकले।
भिक्षा के न मिलने पर विषाद और मिलने पर हर्ष न करे। जितनी भिक्षा से जीवन-निर्वाह हो सके, उतने ही प्रमाण में भिक्षा माँगे। दण्ड, कमण्डलु आदि की मात्रा में भी आसक्ति न करे (यह सुन्दर या दृढ़ है इसे मैं धारण करूंगा और यह रुचिकर नहीं है इसे नहीं धारण करूँगा इत्यादि विचार न करे)।
विशेष रूप से आदर-सत्कार के साथ मिलने वाली भीक्षा की सर्वदा निन्दा (स्वीकार न) करे; क्योंकि पूजापूर्वक होने वाली भिक्षाप्राप्ति से मुक्त (शीघ्र ही मुक्ति को पाने वाला) भी संन्यासी बंध जाता है। (आदर-सत्कार के साथ भिक्षा देने वाले व्यक्ति में ममत्व होने से उस संन्यासी को पुन: संसार में जन्म लेना पड़ता है)।
(सन्यासी) विषयों की ओर आकृष्ट होती हुई इन्द्रियों को थोड़ा भोजन और एकान्त वास के द्वारा रोके (वश में करे)।
(संन्यासी) इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों से रोकने से, राग और द्वेष के त्याग से और प्राणियों की अहिंसा (किसी प्रकार भी पीड़ा न पहुँचाने) से मुक्ति के योग्य होता है।
(शास्रविहित का त्याग और शास्रनिन्दित का आचरण रूप) कर्मो के दोष से उत्पन्न मनुष्यों की तिर्यग्योनि आदि गतियों को, नरक में गिरने को तथा यमलोक की कठोर यातनाओं को विचार करे।
प्रिय (मित्र, पुत्र, स्री आदि) से वियोग, अप्रियों (शत्रु, हिंसक जीव, रोग, शोक आदि नहीं चाहे गये) से संयोग (साथ) होने, बुढ़ापे से आक्रांत होने और रोगों से पीड़ित होने का विचार करे।
इस शरीर से जीवात्मा को बाहर निकालने (मरने), फिर गर्भ में उत्पन्न होने और इस अन्तरात्मा का हजारों करोड़ (शृगाल, कीट, पतंग, अत्यन्त नीच) योनियों में पैदा होने का चिन्तन करे।
शरीरधारियों (जीवों) के अधर्म से उत्पन्न (दु:ख-सम्बन्ध को धर्मकारणक ब्रह्मप्राप्ति रूप प्रयोजन से अक्षय सुख के सम्बन्ध का चिन्तन करे)।
योग (विषयों से चित्त-व्यापार को रोकना) से परमात्मा की सूक्ष्मता (सर्वव्यापकता) का और उत्तम, मध्यम तथा नीच शरीर में (अपने कर्मो को भोगने के लिए) उत्पत्ति का चिन्तन करे।
जिस किसी भी आश्रम में रत रहता हुआ (उसके कुछ विरुद्ध आचरण करने से) दोषयुक्त होता हुआ भी सब जीवों में (ब्रह्मबुद्धि रखने के कारण) समान दृष्टि होकर धर्म का आचरण करे; क्योंकि (कोई) चिह्न-विशेष धर्म का कारण नहीं होता है।
यद्यपि निर्मली का फल पानी को स्वच्छ करने वाला है, किन्तु उसके नाममात्र लेने से पानी स्वच्छ नहीं होता। (इसी प्रकार केवल किसी धर्म के चिह्न धारण करने से और धर्म का पालन नहीं करने से धर्म नहीं होता)।
शरीर के पीड़ित होने पर भी रात में या दिन में सब जीवों की रक्षा के लिए सर्वदा भूमि को देखकर चले।
संन्यासी अज्ञान से जिन जीवों को दिन-रात में मारता है, उनकी (हत्या से उत्पन्न पाप) की शुद्धि के लिए स्नान कर छः प्राणायाम करे।
व्याहति और प्रणव से युक्त विधिपूर्वक किये गये तीन प्राणायाम को भी ब्राह्मण के लिए अतिश्रेष्ठ तप समझना चाहिए।
जिस प्रकार सोना-चाँदी आदि धातु की मैल आग में धौंकने (तपाने) से जल जाती है, उसी प्रकार प्राणवायु के रोकने (प्राणायाम करने) से इन्द्रियों के दोष नष्ट हो जाते हैं।
प्राणायामों से रोग आदि दोषों को, परमात्मा में मन को लगाने से पापों को, विषयों से इन्द्रियों को रोककर विषय-संसर्गो को और ध्यान से ईश्वर-भिन्न काम, क्रोध लोभादि गुणों को जलावे-नष्ट करे।
इस अन्तरात्मा (जीव) की ऊंचे-नीचे (देव-पशु आदि) योनियों में शास्त्र से असंस्कृत बुद्धि वाले व्यक्तियों के द्वारा दुर्जय गति को परमात्मा ध्यान के अभ्यास से देखे। (इस प्रकार के अविद्या, काम्य तथा निषिद्ध कर्मो से ये गतियाँ मिलती हें, यह जानकर ब्रह्मज्ञान से युक्त हो जावे)।
ब्रह्म के साक्षात्कार से युक्त मनुष्य कर्मो से बाँधा नहीं जाता (जन्मजरामरणादि दुखः पाने के लिए संसार में जन्म नहीं लेता अर्थात्‌ मुक्त हो जाता है) और ब्रह्मसाक्षात्कार से रहित मनुष्य संसार को प्राप्त करता (संसार में बार-बार जन्म ग्रहण करता) है।
अहिंसा, विषयों की अनासक्ति, वेदप्रतिपादित कर्म और कठिन तपश्चरणों से इस लोक में उस पद (ब्रह्मपद) को साध लेते हैं । (इन कर्मो के आचरण से) ब्रह्म प्राप्ति कर लेते हैं।
(उक्त दो श्लोकों से क्रमश: ब्रह्मदर्शन तथा उसके सहकारी कर्म को मोक्ष का साधन बतलाकर अब मोक्ष के अन्तरङ्गभूत यत्न और संसार से वैराग्य के लिए देह स्वरूप को अग्रिम दो श्लोकों से कहते हैं-) हड्डी रूप खम्भों वाला, स्नायु (रूप रस्सी) से युक्त, मांस और रक्तरूपी लेप (चूने से लिपना) वाला, चमड़े से ढका हुआ (पर्दे से युक्त), मल-मूत्र से भरा हुआ,
दुर्गन्धयुक्त बुढ़ापा और शोक से युक्त, रोगों का घर, भूख-प्यास आदि से पीड़ित, रज (धूलि, पक्षान्तर में रजोगुण) से युक्त, अनित्य (नाशशील) इस भूत (भूतप्रेतादि, पक्षान्तर में पृथ्वी-जल-तेज-वायु-आकाश रूप पञ्चमहाभूतों का आश्रय) इस (देह) को छोड़ दे (फिर देह को धारण नहीं करना अर्थात्‌ संसार में जन्म लेना नहीं पड़े, ऐसा उपाय करे)।
जिस प्रकार पेड़ नदी के किनारे को छोड़ता (नदी वेग से अपने पतन को नहीं जानता हुआ गिर जाता) है; और उस पेड़ को स्वेच्छा से जैसे पक्षी छोड़ देता हे, उसी प्रकार इस शरीर को छोड़ता हुआ (संन्यासी) कष्टकारक ग्रह (पुन: शरीरधारण) से छूट जाता है।
जब (संन्यासी) विषयों में दोष की भावना से सब विषयों से निःस्पृह हो जाता है, तब इस लोक में (सन्तोषजन्य) तथा परलोक में (मोक्ष लाभ रूप) नित्य सुख को प्राप्त करता है।
इस प्रकार सब संगों (विषयासक्तियों) को धीरे-धीरे छोड़कर तथा सब रन्द्रो (मान-अपमान, सर्दी-गर्मी, स्तुति-निन्दा, लाभ-हानि आदि) से छुटकारा पाकर (संन्यासी) ब्रह्म में ही लीन हो जाता है।
यह सब (पूर्व श्लोक में कहा गया पुत्र, धन, दारादि में ममत्व का त्याग, मानापमान का अभाव एवं ब्रह्म की प्राप्ति) परमात्मा में ध्यान से होता है। अध्यात्मज्ञान से शून्य ध्यान का फल (पूर्वोक्त ममत्वत्याग आदि) कोई भी नहीं प्राप्त कर सकता है।
(पहले ब्रह्म के ध्यान करने के लिए कहकर अब वेदजप करने का उपदेश करते हैं-) यज्ञ तथा देव के प्रतिपादक वेदमन्त्र को, जीव के स्वरूप का प्रातिपादक वेदमन्त्र को और ब्रह्मप्रतिपादक ('सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ इत्यादि) वेदान्त में वर्णित मन्त्र को जपे।
वेदार्थ को नहीं जानने वालों के लिए यही वेद शरण (गति) है, (क्योंकि अर्थज्ञान के बिना भी वेदपाठ करने से पाप क्षय होता है) और वेदार्थ जानने वालों के लिए स्वर्ग (तथा मोक्ष) चाहने वालों के लिए भी यही वेद शरण (गति) है।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि-) इस क्रम (६।३३-८४) से जो द्विज संन्यास लेता है वह इस संसार में पाप को नष्टकर (ब्रह्म के साक्षात्कार द्वारा औपाधिक शरीर के नष्ट होने से) उत्कृष्ट ब्रह्म को प्राप्त करता है (ब्रह्म के साथ एकीभाव प्राप्त कर मुक्त हो जाता है)।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि) “आप लोगों से मैंने मन को वश में करने वाले यतियों (कुटीचर, बहूदक, हंस और परमहंस भेद से चतुर्विध? संन्यासियों) के सामान्य धर्म को कहा है” अब वेदसंन्यासिक आप लोग सुनें।
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति (संन्यास) - ये चार आश्रम गृहस्थ से उत्पन्न होते हैं।
शास्र के अनुसार ग्रहण किये गये ये चारों आश्रम (६।८७) विधिवत्‌ अनुष्ठान करने वाले ब्राह्मण को परमगति (मोक्ष लाभ) को प्राप्त कराते हैं।
इन सभी आश्रमों (६।८७) में से वेद तथा स्मृतियों के अनुसार (अग्निहोत्र आदि) अनुष्ठान करने से गृहस्थ ही श्रेष्ठ कहा जाता है; क्योंकि वह इन तीनों (ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी) का (अन्नदान आदि के द्वारा) पालन करता है (इस में से भी गृहस्थ श्रेष्ठ है)।
जिस प्रकार सभी नदी और नद समुद्र में स्थिति को पाते (मिलते) हैं उसी प्रकार सभी आश्रम वाले (ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी) गृहस्थ में ही स्थिति (भिक्षालाभादि से आश्रय) को पाते हैं।
इन चारों आश्रमों में रहने वाले द्विजों को दस प्रकार के (६।९ २) धर्म का यत्लपूर्वक नित्य सेवन करना चाहिए।
घृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच (पवित्रता) इन्द्रियों को वश में करना, विद्या, सत्य, क्रोध का त्याग ये दस धर्म के लक्षण हैं।
जो ब्राह्मण (द्विजमात्र) इस दस लक्षण वाले धर्मो का अध्ययन करते हैं और अध्ययन करके उसका आचरण करते हैं, वे परमगति (मोक्ष) को जाते हैं।
उस दस लक्षण वाले धर्म (६।९२) को पालन करता हुआ द्विज सावधान चित्त होकर वेदान्त (उपनिषद्‌ आदि) को विधिवत्‌ (गुरु मुख से) सुनकर ऋणत्रय (६।३-६।३७) से छुटकारा पाकर संन्यास ग्रहण करे।
सब कर्म (गृहस्थ के) करने योग्य अग्निहोत्र यज्ञ आदि का त्याग कर कर्मजन्य दोष (अज्ञातावस्था में की हुई जीवहिंसा आदि) प्राणायाम (६।६९) से नष्ट करता हुआ जितेन्द्रिय होकर ग्रन्थ तथा अर्थ से वेदों का अभ्यास कर पुत्र के ऐश्वर्य में रहे। (पुत्र के द्वारा प्राप्त भोजन वस्त्र का उपभोग करता हुआ रहे) । यह 'कुटीचर' संन्यासी का लक्षण है।
इस प्रकार सब कर्मो (गृहस्थ के त्याग अग्निहोत्रादि) का त्यागकर अपने (ब्रह्मसाक्षात्कार रूप) कार्य को प्रधान मानता हुआ (स्वर्ग आदि में भी) निस्पृह होकर संन्यास के द्वारा पापों को नष्ट कर (द्विज) परमगति (मोक्ष) को पाता है।
(भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि-) आप लोगों से यह ब्राह्मण के चार प्रकार (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) का धर्म पुण्य तथा अक्षय फल देने वाला कहा, अब (आप लोग) राजाओं के धर्म को (सातवें अध्याय में) जानो।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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