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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 57
अलाभे न विषादी स्याल्लाभे चैव न हर्षयेत्‌ । प्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रासङ्गाद्विनिर्गतः ।।
भिक्षा के न मिलने पर विषाद और मिलने पर हर्ष न करे। जितनी भिक्षा से जीवन-निर्वाह हो सके, उतने ही प्रमाण में भिक्षा माँगे। दण्ड, कमण्डलु आदि की मात्रा में भी आसक्ति न करे (यह सुन्दर या दृढ़ है इसे मैं धारण करूंगा और यह रुचिकर नहीं है इसे नहीं धारण करूँगा इत्यादि विचार न करे)।
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