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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 52
कृल्प्तकेशनखश्मश्रुः पात्री दण्डी कुसुम्भवान्‌ । विचरेन्नियतो नित्यं सर्वभूतान्यपीडयन्‌ ।।
बाल, नाखून और दाढ़ी-मूँछ कटवाकर (बिलकुल मुण्डन कराकर) भिक्षापात्र (मिट्टी का सकोरा आदि), दण्ड तथा कमण्डलु को लिये हुए सभी (किसी भी) प्राणी को पीड़ित न करता हुआ संन्यासी) सर्वदा विचरण करे।
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