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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 2
गृहस्थस्तु यदा पश्येद्दलीपलितमात्मनः । अपत्यस्यैव चापत्यं तदाऽऽरण्यं समाश्रयेत्‌ ।।
जब गृहस्थाश्रमी बली (अपने शरीर के चमड़े को सिकुड़ा हुआ) पके हुए बाल तथा अपने पुत्र के पुत्र (पौत्र) को देख ले, तब वन का आश्रय, (वानत्रस्थाश्रम में प्रवेश) करे ।
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