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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 77
जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम्‌ । रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत्‌ ।।
दुर्गन्धयुक्त बुढ़ापा और शोक से युक्त, रोगों का घर, भूख-प्यास आदि से पीड़ित, रज (धूलि, पक्षान्तर में रजोगुण) से युक्त, अनित्य (नाशशील) इस भूत (भूतप्रेतादि, पक्षान्तर में पृथ्वी-जल-तेज-वायु-आकाश रूप पञ्चमहाभूतों का आश्रय) इस (देह) को छोड़ दे (फिर देह को धारण नहीं करना अर्थात्‌ संसार में जन्म लेना नहीं पड़े, ऐसा उपाय करे)।
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