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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 80
अनेन विधिना सर्वास्त्यक्तवा सङ्गाञ्छनैः शनैः । सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तो ब्रह्मण्येवावतिष्ठते ।।
इस प्रकार सब संगों (विषयासक्तियों) को धीरे-धीरे छोड़कर तथा सब रन्द्रो (मान-अपमान, सर्दी-गर्मी, स्तुति-निन्दा, लाभ-हानि आदि) से छुटकारा पाकर (संन्यासी) ब्रह्म में ही लीन हो जाता है।
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