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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 58
अभिपूजितलाभांस्तु जुगुप्सेतैव सर्वशः । अभिपूजितलाभैश्च यतिर्मुक्तोऽपि बध्यते ।।
विशेष रूप से आदर-सत्कार के साथ मिलने वाली भीक्षा की सर्वदा निन्दा (स्वीकार न) करे; क्योंकि पूजापूर्वक होने वाली भिक्षाप्राप्ति से मुक्त (शीघ्र ही मुक्ति को पाने वाला) भी संन्यासी बंध जाता है। (आदर-सत्कार के साथ भिक्षा देने वाले व्यक्ति में ममत्व होने से उस संन्यासी को पुन: संसार में जन्म लेना पड़ता है)।
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