मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 84
अनेन क्रमयोगेन परिव्रजति यो द्विजः । स विधूयेह पाप्मानं परं ब्रह्माधिगच्छति ।।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि-) इस क्रम (६।३३-८४) से जो द्विज संन्यास लेता है वह इस संसार में पाप को नष्टकर (ब्रह्म के साक्षात्कार द्वारा औपाधिक शरीर के नष्ट होने से) उत्कृष्ट ब्रह्म को प्राप्त करता है (ब्रह्म के साथ एकीभाव प्राप्त कर मुक्त हो जाता है)।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें