अनेन क्रमयोगेन परिव्रजति यो द्विजः ।
स विधूयेह पाप्मानं परं ब्रह्माधिगच्छति ।।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि-) इस क्रम (६।३३-८४) से जो द्विज संन्यास लेता है वह इस संसार में पाप को नष्टकर (ब्रह्म के साक्षात्कार द्वारा औपाधिक शरीर के नष्ट होने से) उत्कृष्ट ब्रह्म को प्राप्त करता है (ब्रह्म के साथ एकीभाव प्राप्त कर मुक्त हो जाता है)।
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