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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 27
तापसेष्वेव विप्रेषु यात्रिकं भैक्षमाहरेत्‌ । गृहमेधिषु चान्येषु द्विजेषु वनवासिषु ।।
(फल मूल के सर्वथा असम्भव हो जाने पर वानप्रस्थाश्रमी) जीवननिर्वाह के लिये केवल तपस्वी वानम्रस्थश्रमियों के यहाँ भिक्षाग्रहण करे और उनका भी अभाव होने पर वन में निवास करने वाले अन्य गृहस्थ द्विजों से भिक्षा ग्रहण करे।
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