ध्यानिकं सर्वमेवैतद्यदेतदभिशब्दितम् ।
न ह्यनध्यात्मवित्कश्चित्क्रियाफलमुपाश्नुते ।।
यह सब (पूर्व श्लोक में कहा गया पुत्र, धन, दारादि में ममत्व का त्याग, मानापमान का अभाव एवं ब्रह्म की प्राप्ति) परमात्मा में ध्यान से होता है। अध्यात्मज्ञान से शून्य ध्यान का फल (पूर्वोक्त ममत्वत्याग आदि) कोई भी नहीं प्राप्त कर सकता है।
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