सर्वेषामपि चैतेषां वेदश्रुतिविधानतः ।
गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठः स त्रीनेतान्बिभर्ति हि ।।
इन सभी आश्रमों (६।८७) में से वेद तथा स्मृतियों के अनुसार (अग्निहोत्र आदि) अनुष्ठान करने से गृहस्थ ही श्रेष्ठ कहा जाता है; क्योंकि वह इन तीनों (ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासी) का (अन्नदान आदि के द्वारा) पालन करता है (इस में से भी गृहस्थ श्रेष्ठ है)।
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