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मनुस्मृति • अध्याय 6 • श्लोक 12
देवताभ्यस्तु तद्धुत्वा वन्यं मेध्यतरं हविः । शेषमात्मनि युञ्जीत लवणं च स्वयं कृतम्‌ ।।
वन में उत्पन्न अत्यन्त पवित्र उस हविष्यान्न से देवों के उद्देश्य से हवन कर बचे हुये अन्न को भोजन करे तथा स्वयं बनाये हुए लवण (क्षार मिट्टी से बनाये गये नमक) को काम में लावे।
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